Wednesday, April 16, 2014

खोई सी अवाज़

       कल एक ढाबे पे नाश्ता करते हुए अचानक सड़क के उस और एक पेड़ से कोयल की कूक सुनाई दी। वैसे तो ताउम्र मैं ' चिड़ियाओ की मधुर आवाज, नदियों का मधुर संगीत ' जैसी बातें करने वालों की मजाक उडाता रहा हूँ मगर जब कल वो कूक मेरे कानो पे पड़ी तो मुझे इन वाक्यों में पहली बार सौंदर्य दिखाई पड़ा। 
       ऐसा भी नहीं की मैं किसी आपाधापी से भरे बड़े शहर का निवासी हूँ जिन्हे चिड़िया की आवाज का तो छोड़िये चिड़िया का ही पता नहीं होता। एक अच्छे खासे हरे भरे छोटे से कस्बे  का मैं निवासी हूँ जहाँ सुबह और शाम का पता आज भी चिड़ियों के  कोलाहल से चलता है । इसके बावजूद जब मुझे कोयल की कूक सुन कर कुछ अलहदा सा लगा तो मुझे अहसास हुआ की कहीं न कहीं, धीरे-धीरे से, शायद मैं भी उन्ही अभागे शहरवासियों सा हो चला हूँ जिनके लिए कोयल की कूक किसी एलियन जहाज के मधुर हॉर्न सी होती है ।
  
        मैं जिस शहर की यहाँ पर बात कर रहा हूँ वो है देहरादून, एक ऐसा शहर जो की जाना जाता है अपने सुगन्धित बासमती चावल, सुस्वादु लीची, शांत माहौल, सुहाने मौसम और हरे-भरे पर्यावेश के लिए। पिछले अगस्त से यहाँ पर रहते हुए मुझे इनमे से हर बात खोती हुई ही लगी और कल जब कोयल की कूक सुन मैं खुद ही खो सा गया तो मुझे अहसास हुआ की शायद अब देहरादून भी शामिल हो चला है उसी पहचान बनाने की दौड़ में जिसमे शामिल होकर इस जैसे शहर खो देते हैं अपनी असल पहचान, अपनी आत्मा । 

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