Monday, November 9, 2015

उड़ने
मैं चला
और उलझ पड़ा
पेड़ों पर पतंग सा
न उड़ता न उतरता !

बहने
मैं चला
समझ़ खुद को
कागज की कश्ती,
सोचा था तैरूंगा कुछ
फिर गल के हो जाउंगा पानी |
पर मिलावट थी कहीं मुझमें
न गला न बहा,
डूबता ही गया
हाँ बस
डूबता |

Wednesday, July 23, 2014

अलविदा

 सदियाँ बीतीं मौसम गुजरे ,

उनका कोई पैगाम न था । 

जीवन की इस दौड़ में लेकिन ,

ग़म का कोई काम न था । 



वक़्त गुजरा काफी जब हुए थे जुदा वो ,

कह के हमसे कि ये आख़िरी अलविदा न हो । 


Wednesday, April 16, 2014

खोई सी अवाज़

       कल एक ढाबे पे नाश्ता करते हुए अचानक सड़क के उस और एक पेड़ से कोयल की कूक सुनाई दी। वैसे तो ताउम्र मैं ' चिड़ियाओ की मधुर आवाज, नदियों का मधुर संगीत ' जैसी बातें करने वालों की मजाक उडाता रहा हूँ मगर जब कल वो कूक मेरे कानो पे पड़ी तो मुझे इन वाक्यों में पहली बार सौंदर्य दिखाई पड़ा।