उड़ने
मैं चला
और उलझ पड़ा
पेड़ों पर पतंग सा
न उड़ता न उतरता !
बहने
मैं चला
समझ़ खुद को
कागज की कश्ती,
सोचा था तैरूंगा कुछ
फिर गल के हो जाउंगा पानी |
पर मिलावट थी कहीं मुझमें
न गला न बहा,
डूबता ही गया
हाँ बस
डूबता |
मैं चला
और उलझ पड़ा
पेड़ों पर पतंग सा
न उड़ता न उतरता !
बहने
मैं चला
समझ़ खुद को
कागज की कश्ती,
सोचा था तैरूंगा कुछ
फिर गल के हो जाउंगा पानी |
पर मिलावट थी कहीं मुझमें
न गला न बहा,
डूबता ही गया
हाँ बस
डूबता |
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